मैंने अपने इस लेख में माता-पिता बनने के सफर को अपने शब्दों में बयान करने की कोशिश की है आशा है आप सब को भी अपना सफर याद आ जाये।
चाहे किसी दम्पति की लव मैरिज हो या अरेंज मैरिज शादी के बाद उस लड़के और लड़की के न जाने कितने रिश्ते अपने आप बन जाते है।जैसे शादी होते ही लड़का लड़की से पति-पत्नी हो जाते हैं,लड़की बन जाती है बहु,चाची,भाबी,मासी,मामी और भी न जाने कितने रिश्तों के नाम जुड़ जाते हैं।ठीक उसी प्रकार लड़का भी बहुत सारे नामों से पुकारा जाता है,इतने सारे रिश्तों से जुड़ कर भी उनकी अपनी एक अलग जिंदगी होती है,जिसमें वो कभी लड़ते है झगड़ते है,रूठते है मनाते है,कभी बहस कर लेते है कभी बातचीत बंद कर देते है।लेकिन जिस दिन उन दोनों को पता चलता है कि कोई तीसरा अपना हमारे बीच आने वाला है या यूँ कहे जिस पल उनको पता चलता है कि वह दोनों पति-पत्नी से माता-पिता बनने वाले है उसी पल से उनकी ज़िंदगी बदल जाती है।जिस दम्पति को ये खुशी शादी के कुछ महीनों बाद मिल जाती है उनका तो नही पता लेकिन जिस दम्पति को शादी के बहुत सालों बाद ये खुशी मिलती है उनको तो इतनी ज़्यादा खुशी होती है कि समझ ही नही आता कि मुस्कुराए,हंसे,नाचे या गाना गाये।उस वक्त जो महसूस किया जाता है उन भावनाओं को शब्दों में बयान करना जरा मुश्किल है।सही मायने में जिस दिन किसी दम्पती को अपना अंश आने की खबर मिलती है उसी दिन से वह माता-पिता बन जाते है,अचानक से एक जिम्मेदारी का भाव स्वयं ही उतपन्न हो जाता है।होने वाला पिता वह सब काम खुशी -खुशी करता है जो वह एक पति के रूप में करना पसंद नही करता है या फिर जिनको कभी-कभी मजबूरी में करता है।जैसे-पानी भर देना,कपड़े सुखा देना और पत्नी के आराम का पूरा ख्याल रखना,हालांकि कुछ सालों पहले तक पति यदि घर के कामों में पत्नी का हाथ बटाता था तब उसे अजम्भा माना जाता था परंतु आज के जमाने के ज्यादातर दम्पति कामकाजी होने के नाते घर के सारे काम दोनों मिलकर करते हैं।उसके बाद चालू होता है हर माह गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास को महसूस करना।जैसे अपने बच्चे की पहली धड़कन को सुनना,पहली सोनोग्राफी में अपने बच्चे की छवि को ढूंढने का प्रयास करना बल्कि तब बच्चा सिर्फ एक बिंदु के तौर पे दिखता है,फिर धीरे-धीरे हर सोनोग्राफी में उसके विकास के बारे में डॉक्टर से पता करना और जैसे -जैसे बच्चे के जन्म का समय नज़दीक आता जाता जाता है माता-पिता खुशी,घबराहट और डर न जाने कितने प्रकार की भावनाओं को महसूस करते है।
जिस प्रकार हम किसी पौधे को उगाने के लिये मिट्टी में एक बीज डालते है और फिर मिट्टी उसे पानी,सूरज की रोशनी आदि के सहयोग से सींचती है ठीक उसी प्रकार एक माता अपने होने वाले बच्चे को पूरे नों महीने अपने गर्भ में पालती है।पिता को तो सिर्फ पिता बनने की ख़ुशी महसूस करनी होती है किंतु एक माता को न जाने कितने सारे मानसिक,भावनात्मक और शारीरिक उतार चढ़ावों से गुजरना पड़ता है गर्भावस्था के दौरान। ज़्यादातर महिलाएं गर्भावस्था के शुरू के तीन से चार महीने तक कुछ भी खा नही पाती भूख तो बहुत लगती है किंतु जैसे ही कुछ भी खाती है तुरंत उल्टी हो जाता है,शरीर में बिल्कुल ताकत नही बचती ऐसे में भी महिलाओं को रोज़मर्रा के घरेलू कार्य तो करने ही पड़ते है यदि पहले से एक और बच्चा है तो उसकी भी देखभाल करनी पड़ती है।ऐसे में पति तथा ससुराल के अन्य सदस्यों का भावनात्मक तथा मानसिक सम्बल होना बहुत आवश्यक है।एक स्त्री अपने अंदर एक दूसरी जान को हरपल बढ़ते हुए महसूस करती है।प्रत्येक माह बच्चे का वजन बढ़ने के साथ- साथ गर्भवती स्त्री का पेट भी बढ़ता जाता है जिसके कारण बैठकर वापस उठने में तथा रोज के नित्य कर्म करने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है।ऐसे में भी आज भी हमारे भारतीय समाज में कई ऐसे पुरुष हैं जो इस वक्त में पत्नी को मानसिक और भावनात्मक सम्बल देने के बदले किसी दूसरी स्त्री से सम्बन्ध जोड़ लेते है चूंकि ऐसी हालत में पत्नी उनको शारीरिक सुख प्रदान नही कर पाती,प्रत्येक पति ऐसा नही होता किंतु बहुत सारे लोग ऐसा करते है।
ननों महीने के बाद जब बच्चा पैदा होने के वक्त माता जो सात से आठ घण्टे प्रसव पीड़ा सहने के बाद जो दर्द सहती है उस दर्द के सामने दुनिया का हर दर्द कम है,जब भी कोई औरत बच्चा पैदा करती है यकीनन वह उसका दूसरा जन्म होता है। मैंने कही पढ़ा था एक बच्चा पैदा करने पर एक माँ की पाँच वर्ष आयु कम हो जाती है।जब एक पत्नी डॉक्टर और नर्सेस के साथ प्रसव पीड़ा से अस्पताल के कमरे के अंदर तड़प रही होती है तब एक पिता उस कमरे के बाहर जिसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा होता है जैसे सीने से बाहर निकल के वापस जा रहा हो,टेंशन के मारे उसका दिमाग काम नही कर रहा होता हाथ-पैर जैसे फूल से जाते है बहुत सारा तनाव तथा घबराहट को अपने अंदर समेट कर वह चहलकदमी कर रहा होता है।एक तरफ बच्चे के आने से पिता बनने की खुशी हो रही होती है दूसरी तरफ पत्नी जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही होती है ये मज़ाक नही है आज भी कई माताएं अपने शिशु को जन्म देने के दौरान अपनी जान गवां देती है।असली खुशी तभी महसूस होती है जब जच्चा-बच्चा दोनों की सलामती की खबर मिलती है।
माता-पिता की असली परीक्षा तो बच्चे के इस दुनिया में आने के बाद शुरू होती है।कुछ बच्चे तो इतने शांत होते है कि शुरू के तीन महीने दिनभर रातभर सोते है और कुछ शुरू के तीन महीने दिन में तो सो जाते है और रातको हररोज़ दो से तीन घण्टा इतनी जोर-जोर से रोते है कि आस-पास के लोगों की भी नींद हराम हो जाती है।बच्चे होने के बाद माता-पिता को उनके हिसाब से जागना ओर सोना पड़ता है।एक माँ और बच्चे का इतना अनोखा रिश्ता होता है क्योंकि बच्चा अपनी हर बात सिर्फ रोकर ओर हंस के बताता है तब भी माँ बच्चे की हर बात को बिना कुछ कहे ही समझ लेती है।एक पिता जो बच्चा होने से पहले ज्यादातर दोस्तों के साथ वक्त बिताना पसन्द करता है वह बच्चा होने के बाद अपने बच्चे के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिता कर उसपर अपना प्यार लुटाता है तथा उसके हर हाव भाव को देखकर खुश होता रहता है।बच्चों को बड़ा करने के दौरान बहुत ध्यान,धेर्य, सजगता तथा दौड़-धूप करनी पड़ती है अपना सुख,चैन,आराम,नींद सब त्यागना पड़ता है।लेकिन तब भी बच्चे की एक मुस्कान के आगे सारी परेशानियां कम लगती है।बच्चे को पालना किसी तपस्या से कम नही है,ये सब हम सब तब तक महसूस नही कर सकते जब तक स्वयं माता-पिता नही बन जाते।
किसी भी माता-पिता से ये पूछना बहुत आसान है कि आपने आज तक हमारे लिये किया ही क्या है और उसका जवाब देना उतना ही मुश्किल है क्योंकि माता-पिता जो हमारे लिये करते है उसको बयां नही किया जा सकता।

बहुत ही मार्मिक वर्णन। धन्यवाद
ReplyDeleteपड़ने के लिये आपका भी धन्यवाद।
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